शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

मेरी इबादत पे शक क्यों होता है


तुम मुझे कहते हो अब की मुझे मोहब्बत से डर लगता है 
डरते तो तुम हो  और मेरी इबादत पे शक क्यों होता है
मैंने तो उन दिनों ही सारी जिंदगी जी ली थी 
अब तो मरने का भी गम नहीं है मुझे को 
काश वो दिन कुछ और लम्बे हो जाते 
शादी और सगाई के  बीच के वो दिन 
कुछ और  उधार मै ही मिल जाते 
जब देखा था तुम को मैंने | एक टक देखती रह गई थी 
कभी इतना अपने आप से गुम न हुई  थी 
बस पहली बार में ही प्यार कर बैठी
बात  तो उस वक़्त नहीं हो  पाई थी तुम से  | पर ?
तुम्हारी आँखों से ही हर सवाल का जवाब मिल ही गया था 
वो केसा अद्भुत प्यार और इबादत थी 
हर वक़्त तुम ही तुम दिखाई देते थे 
हर रोज़ आदत बदलती जा रही थी 
वो इंतजार वो लम्हा जाने कब आयेगा 
इस इंतजार में वो राते भी लम्बी हो जाती थी 
बस गुम सूम रहना  और तुम्हारे सपनो में खो जाना 
तुम भी अब कितने बदल गए हो ?
मैंने तो सपनो में ऐसा न देखा था 
इंतजार तो में अब भी करती हूं तुम्हारा 
पहले तुम से मिलने का और अब तुम्हारे घर आने का 
तुम पास तो आके देखो  में तो वही तुम्हारी खुशबू हूं
पहले में तुम्हारा अपने घर  में इंतजार करती  थी 
अब तुम्हारे घर में इंतजार करती हूं
में तो अब भी वही खुशबू हूं , तुम बस अपने प्यार से मुझे सींच के देखो 
एक बार मुझे छु  के देखो अब भी वही गहराई है मेरी इबादत में 
अब तो मैंने वो सब नाज नखरे छोड़ दिए हैं 
अब तुम्हारे नाज नखरे उठाने का मन करता है 
तुम मेरे पास आके तो देखो  अब भी वो ही  ऑंखें है 
जो तुम्हे कभी सकून देती थी 
तुम पास होकर भी नहीं हो 
तो ये ऑंखें मुझे  सिर्फ गमो का   पानी देती हैं 
कितनी बार समझती हूं   पर ये तुम्हे  ही प्यार करती है 
मुझे इंकार कर देती हैं
 दिनेश पारीक