सोमवार, 10 सितंबर 2012

काफी वक़त गुजर गया है (2)

कभी कुछ जतन करता हूँ , कभी कुछ यतन करता हूँ |
फिर भी न जाने  क्यों  मैं उसी  मुहाने पर रहता हूँ  || ??
वक्त के पीछे तो मैं दोड़ नहीं सकता 
बस अपने पुराने ख्यालों मैं जीता हूँ 
वक्त  गुजरता जाता है नई बहु का राज आ जाता हैं 
हम अपने ही घर में बंद पड़े रहते हैं 
उनका स्वागत किया जाता है 
इस दुनिया को दोष दू , या इस ज़माने को दोष दू | 
इस पीढ़ी को दोष दू , या इस जवानी को दोष दू 
तुम सब को इस तरह बना दिया | जवान  तो हम भी  हुए  थे ,
कहूँ तो  ऐसे लगता है की जले पर नमक लगा दिया ||
फिर ना जाने  क्यों मैं तेरी लम्बी उम्र की दुआ करता हूँ ................
इस गोद मैं खेला करता था , अगुली पकड़ कर चला करता था 
 तुम को चलने  में तकलीफ हुई  तो घोडा भी बना करता था 
तुम मेरे होकर भी नए ज़माने के हो गए 
हम तो  अपने घर मैं ही   एक मेहमान  हो गए 
इस उम्र मैं  तेरे ज़माने के साथ चले की  कोशिश  करता हूँ 
फिर भी तुम दूर दिखाई देते हो 
मैं तो उसी मुहाने  पर रह जाता हूँ .............................
मैं तो जिंदगी को बोझ की तरह जी कर रवानगी ले  लूंगा
उस  वक्त   पास आ जाना मैं ख़ुशी ख़ुशी मर लुगा 
फिर ना जाने  क्यों मैं तेरी लम्बी उम्र की दुआ करता हूँ..