शुक्रवार, 1 जून 2012

मट मेला मेरा मन



जीवन की अधर अगनि में तो जल ही रहा हूँ
बुराइयों का छोटा सा घर भी तो बुन रहा हूँ

कभी कहता है मन की काश मैं पैदा होता महलों में
दूर से दिखाई देता ना गूम होता भीड़ भरे मेलों में
लोग झुकते सजदे में पहनाते मालाओं का हार
मन बोला क्यों देखता है सपना तू तो है लाचार
येही तो हर दिन बुन रहा हूँ |
बुराइयों का छोटा सा घर भी तो बुन रहा हूँ ||

अब तो खो गया हूँ झूठ और फरेब की दुनिया मैं
हर चेहरा हंस रहा है जूठी हंसी इस मेले मैं
मैं भी शामिल उन झूठे चेहरों में हूँ
मुख से दीखता भोला अन्दर से मेला हूँ
 तभी तो हर रोज़ एक फरेब बुन रहा हूँ

कभी उसकी कभी इसकी रोटी छीन रहा हूँ
जीवन की अधर अगनि में तो जल ही रहा हूँ

शुक्रवार, 25 मई 2012

ये कैसा नींद में ही ख़याल आया है,

ये कैसा नींद में ही ख़याल आया है,
की जब मैं जगा हुआ होता हूँ
तो कविता दिल के अन्दर जाने कहाँ सोयी हुई होती है.
और जब मैं पूरी नींद में सोया और खोया हुआ होता हूँ
तो मेरे दिल के अन्दर की कविता अंगडाई लेकर जाग सी जाती है
मुझे नीद में ही एकदम जगा देती है
नींद में ही मैं उस कविता को संवारता और लिख देता हूँ
पर जब जाग जाता हूँ, तो रची हुई वो सुन्दर कविता,
जाने मन के किस कोने में छुप सो जाती है,
बहुत ढूँढने से भी नहीं मिलती,
और लिखने के लिए ठीक याद ही नहीं आती,
फिर भी उसे याद कर वैसा ही कुछ जैसा बने लिख दिया करता हूँ
जो उस असली कविता सी सुन्दर नहीं होती
कभी कभी तो वो कविता कुछ याद ही नहीं आती तो लिखूँगा क्या
जैसे आयी थी वैसे ही बेवजह ग़ुम हो जाती है
कृपया मुझ पर हंसिये मत, ये मज़ाक नही सच है
कविता की निंदिया की और उसके छुपने की बात है
नींद से उठकर अभी अभी लिखी हुई फरियाद है
इस मेरी पुरानी कविता का आज फिर ख़याल आया है
क्यूंकि अण्णा और बाबा रामदेव पर कविता अपनेआप बन कर आयी है
कल रात उसे सपने में लिख कर पूर्ण कर डाली है
पर आज लिखना चाहूँ तो नहीं मिल रही है, बड़ी निराशा है,
अब आशा से मैं यहाँ p4poetry पर उसे आपकी लिखावट में बाट तक रहा हूँ
किसी मेम्बर दोस्त के मन में भी उन जैसे भावों की जरूर वह उभरी है
जिसे यहाँ पढ़ मुझे असीम आनंद लेने की उत्कंठ अभिलाषा है

ये रचना दूसरी बार  पोस्ट की जा रही है  
पहले ये रचना १८/०३/२०१२ को पोस्ट की गई थी  मेरे इसी ब्लॉग पे  

बुधवार, 2 मई 2012

महक आती है बदन से पसीने की |


महक आती है बदन से पसीने की |
मुझे जरुरत  नहीं है  खुशबु  लगाने  की ||
मजदूर हूँ   यही  पहचान  है  मेरी
मुझे जरुरत  नहीं है कपड़े बदलने की ||
आराम से सोता हूँ गली या और फूटपातो पेर
मुझे जरुरत  नहीं है बोछोना  बिछाने की ||
सेर पेर छत्त नहीं खुला असमान है |
मुझे जरुरत  नहीं है दुखो से घबराने की ||
मद्धम मद्धम सी रोशनी है चाँद सितारों की
मुझे जरुरत  नहीं है चिराग जलने की ||
दिवालिया होकर बादशाह हो गया हूँ |
अब  जरुरत  नहीं है पैसा कमाने की ||
दिनेश पारीक

बृहस्पतिवार, 12 अप्रैल 2012

मेरा ही नशीब था

न कमी थी कोई जहान में कमजोर मेरा ही नशीब था
सब कुछ पास था उस के | मुझे देने के लिए वो गरीब था |
उस ने बहुत धन दोलत दिया दुनिया को पर में तो एक गरीब था |

जो भी मिला उसी से मिला | ये मेरा ही नशीब था
मेरा जनम हुआ ये भी उस के लिए बड़ा अजीब था |
कोई हंशा, कोई रोया मेरे घर का ये माहोल था
उस वक़्त माँ का दर्द में न समझ पाया था
पर मुझे पता है माँ के में कितना करीब था

जन्म की रात काली थी | चाँद भी न आया था
दिन में बदलो ने डाला डेरा ये मेरा नशीब था
दादा जी कहते है वो साल पड़ा बड़ा अकाल था |
सब कुछ कला था सिर्फ वो ही मेरा गुनगार था
ये कैसा  मेरा नशीब था | ????????

बचपन बिता जवानी आई , घर छोड़ा ये कितना अजीब था
आज तो माँ की ममता के लिए जीता हूँ  | हर रोज़ गम पिता हूँ 

पांच भाई बहनों में बटी माँ की ममता ये भी मेरा ही नशीब था
गाव छोड़ के आया लेकिन यहाँ भी जीना मुहाल था ................

आज आज माँ के साथ मंदिर गया
मंदिर में किसी ने पूछा तेरा चेहरा इतना उदास क्यों है| ?????
बरसती आखों में प्यास क्यों है और तुम मंदिर में क्यों हूँ
जिनकी नजरो में तू कुछ भी नहीं वो तेरे लिए आज इतना खास क्यों है ||?
मैं कुछ न बोल पाया क्यों की वो भी तो मेरा ही रकीब था
न कमी थी कोई जहान में कमजोर मेरा ही नशीब था
दिनेश पारीक

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

भ्रष्टाचारी बात कर रहे भ्रष्टाचार की

भ्रष्टाचारी बात कर रहे भ्रष्टाचार की
नित करते हम नये सवाल,नित ही पाते हैं जवाब
क्या खू़ब हो गर पूछें आज
है कौन बचा अपने में आप
शुरुवात कहीं से करनी है तो
पहले खु़द को ही झाँकें
उसे साफ़ करते ही,खुल जायेंगी सारी आँखें
हमें भी आता मज़ा बहुत है
करते काम वही सारे
होते हैं बदनाम जब नेता
हम हो जाते हैं बेचारे।
बुरा न बोलो,बुरा न देखो
न करो बुरे काम कभी
नित करते रहते हम ये सब
पर है ये हमें स्वीकार नहीं।
क्या खू़ब गज़ब की बातें होती
चर्चायें हर गलियों में
हम भी तो हैं शामिल होते,
उन्हीं जली मोमबत्तियों में
भ्रष्टाचारी बात कर रहे भ्रष्टाचार की…

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

प्रेम कविताएँ


हाँ पापा, मैंने प्यार किया था
उसी लड़के से
जिसे आपने मेरे लिए ढूँढा था।

उसी लड़के से
जो बेटा था आपके ही मित्र का।
हाँ पापा, मैंने प्यार किया था बस उसी से।

फिर क्या हुआ?
क्यों नहीं बन सकी मैं उसकी और वो मेरा?

मैंने तो एक अच्छी बेटी का
निभाया था ना फर्ज?
जो तस्वीर लाकर रख दी सामने
उसी को जड़ लिया था अपने दिल की फ्रेम में।

फिर क्यों हुआ ऐसा कि
नहीं हुआ उसे मुझसे प्यार?

क्या साँवली लड़कियाँ
नहीं ब्याही जाती इस देश में?

क्यों लिखते हैं कवि झूठी कविताएँ?
अगर होता जो मुझमें सलोनापन तो
क्या यूँ ठूकरा दी जाती
बिना किसी अपराध के?

पापा, आपको नहीं पता
कितना कुछ टूटा था उस दिन
जब सुना था मैंने आपको यह कहते हुए
'बस, थोड़ा सा रंग ही दबा हुआ है मेरी बेटी का
बाकि तो कुछ कमी नहीं।

उफ, मैं क्यों कर बैठी उस शो-केस में रखे
गोरे पुतले से प्यार?

मुझे देख लेना था
अपने साँवले रंग को एक बार।

सारी प्रतिभा, सारी सुघड़ताएँ
बस एक ही लम्हे में सिकुड़ सी गई थी।
और फैल गया था उस दिन
सारे घर में मेरा साँवला रंग।

कोई नहीं जानता पापा
माँ भी नहीं।
हाँ, मैंने प्यार किया था
उसी लड़के से
जिसे ढूँढा था आपने मेरे लिए।

शनिवार, 24 मार्च 2012

बचपन

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: मेरा बचपन: खिला एक फूल फिर इन रेगिस्तान में. मुरझाने फिर चला दिल्ली की गलियों में. ग्रॅजुयेट की डिग्री हाथ में थामे निकल गया. इस उम्र मैं ही मैं , जि...

रविवार, 11 मार्च 2012

ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,

ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,
हर बात समझाने के लिए नही होती,
याद तो अक्सर आती है आप की,
लकिन हर याद जताने के लिए नही होती

महफिल न सही तन्हाई तो मिलती है,
मिलन न सही जुदाई तो मिलती है,
कौन कहता है मोहब्बत में कुछ नही मिलता,
वफ़ा न सही बेवफाई तो मिलती है

कितनी जल्दी ये मुलाक़ात गुज़र जाती है
प्यास भुजती नही बरसात गुज़र जाती है
अपनी यादों से कह दो कि यहाँ न आया करे
नींद आती नही और रात गुज़र जाती है

उमर की राह मे रस्ते बदल जाते हैं,
वक्त की आंधी में इन्सान बदल जाते हैं,
सोचते हैं तुम्हें इतना याद न करें,
लेकिन आंखें बंद करते ही इरादे बदल जाते हैं

कभी कभी दिल उदास होता है
हल्का हल्का सा आँखों को एहसास होता है
छलकती है मेरी भी आँखों से नमी
जब तुम्हारे दूर होने का एहसास होता है

विचार मेरे और आपके

शनिवार, 10 मार्च 2012

आज फिर उदास है जिंदगी???

आज फिर उदास है जिंदगी???
आज फिर उदास है जिंदगी
ए जिंदगी तू क्या रंग लाएगी
समझ न पाया कोई
तू क्या मुझे समझ पाएगी
दर्द दिया है इस सिने में
क्यो तूने है मुझे रुलाया
इंतेज़्ज़र है जिसका मुझे
उनसे क्यो तूने मुझे न मिलाया
मिल भी गये गर कभी
तो क्या अंजाम देगी तू, ए जिंदगी
टूटे दिल को तूने मारना भी न सिखाया


मेरी कविताओं का संग्रह