मंगलवार, 4 सितंबर 2012

काफी वक़त गुजर गया है

काफी वक़त गुजर गया  है
यु ही खाट पे बैठे- बैठे 
अब आवाजे आती हैं रिश्तों की 
कभी रिसने की कभी  गांठ लगाने की 
अब आवाजें आती है 
कभी टूटने की  तो कभी जुड़ने की 
काफी वक़त गुजर चुका रिश्तो को  ढोते - ढोते 
अब तो खुद को ढूढता  हूँ रिश्तो में जीते - जीते 
वक्त नहीं ठहरता अहसास ठहर जाते है
यादो के भीतर से बस जख्म उभर आते है
कुछ खुशियों के पल दे जाते है 
कुछ ग़मों से दिल छिल जाते हैं 
रिश्तों से लिखा अब मिटने लगा है 
धुआं सा रह गया है जोश बुझने लगा है 
आज फिर वही आवाजें आने लगी गई 

19 टिप्‍पणियां:

  1. वक्त नहीं ठहरता अहसास ठहर जाते है
    यादो के भीतर से बस जख्म उभर आते है
    जो थोडा रिसते ,नासूर बन टीसते जाते हैं !

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  2. रिश्तों की आवाजें गूंजती हैं उम्र भर ...

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  3. jindgi ki shaam ke sath sath kayi rishton ki bhi jab shaam hone lagti hai to man me chubhan hona swabhawik hai.

    samvedansheel rachna.

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  4. Maana ki rishtey takleef dete hai, gar pyar ho sachha to jine ki vajah bhi yahi banate hai.

    Waqt ka pahiya aise chalta, jugunu jaise jalta bujhata.

    Is jugnu ko pakad jo paye
    waqt usi ke sang ho jaye.

    Teena.
    https://udaari.blogspot.in/

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  5. कुछ खुशियों के पल दे जाते है
    कुछ ग़मों से दिल छिल जाते हैं ..behtarin...

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  6. काफी वक़त गुजर चुका रिश्तो को ढोते - ढोते
    अब तो खुद को ढूढता हूँ रिश्तो में जीते - जीते

    ...बहुत मर्मस्पर्शी और सटीक अभिव्यक्ति..

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  7. सुंदर प्रस्तुति रिश्तों के दर्द की और कुसियों की ।

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  8. wah bhai ! shandar likha hai ....ehsas dil par asar karte hain

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  9. बहुत शानदार दिल को छूती बेहतरीन भावपूर्ण रचना,,,,,

    WELCOME TO MY RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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  10. अर्थ गर्भित नव भाषिक प्रयोग लिए अभिनव रचना सुन्दर ,मनोहर . उदास कर गई .मन भर गई .
    शुक्रवार, 7 सितम्बर 2012
    शब्दार्थ ,व्याप्ति और विस्तार :काइरोप्रेक्टिक

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