रविवार, 10 मार्च 2013

अर्ज सुनिये

विनती  सुनिये हे  समाज हमारी
दुविधा  में पड़ी  हूँ  जंजीरो  से जकड़ी  हूँ 
विनती  सुनिये  हे  नाथ हमारी .............................
इस दुविधा  की घडी  मैं  इस अत्याचारों  की गली में  ... 
विनती  सुनिये  हे  कृष्ण  मुरारी 
भरे  मेरे विलोचन  नयेना दुख  पड़ा है भरी 
कु द्रष्टि हो रही है  ये तेरी नारी  
विनती  सुनिये  हे  ब्रिज  बिहारी 
पल पल  जीती  पल पल मरती 
पल भर में ही मर मर  जाती 
किस 2 आँखों  से  बचूं  किस  2 आँखों  में खो जाऊं  
हर  दिन शर्मिंदा  होती  किस दुनिया में  खो जाऊं 
 इस धरा  पर बोझ  पड़ा  है भारी  हे  मेरे  कृष्ण  मुरारी ..... विनती 
 विनती सुनिये   श्री रणछोड़  बिहारी ........ विनती  
हर  दिन तपती  हर दिन  खोती  इस समाज  की मारी 
हर दिन  मैं ही  तो  गर्भ  में  जाती मारी 
इस व्यथा  को  किस  तरह  सुनाऊ  हें  ब्रज  बिहारी 
च्चकी  के पाटों  में  मैं  पिसती 
हर  बिस्तर  पर  में ही जलती 
हर चोराहों  पर में नंगी  होती 
हर  मंदिर  में   मैं  ही पूजी  जाती 
फिर में ही  बलि  के लिए  उतारी  जाती 
हर पल  द्रोपती  मुझे  ही बनाई  जाती 
अर्ज सुनिये  हे  गोपाल  हमारी .......... विनती सुनिये  हे  नाथ हमारी 
दिनेश  पारीक