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बुधवार, 19 सितंबर 2012

मनहूस


मुझे तो  लोगो  ने  मनहूस  करार  दे दिया
मुझे तो अपनों ने सदाचार से दुराचार दे दिया
वहा भटक भी जाता मैं  जिन गलियों मैं वो थे
वहा रूक भी जाता मैं जी गलियों मैं वो थे |
हम तो उस दिन भी मोहबब्त करने गए थे
जिस दिन उन होने मुझे मुझे बे वफ़ा करार देदिया ||
मनहूस तो सायद था  ही में
मनहूस ही जन्मा  था मैं
तभी तो आपने मुझे कन्यादान का पुकार देदिया ....
मोहबब्त के कीड़े  मर गए दिल ही दिल में
 दीवाना बे मोहबब्त किये  मशहूर हो गया
जहाँ दिन के उजालों में  खुला प्यार चलता हो
वहा उनकी शादी  देखने को भी मैं मजबूर हो गया
 किस को पुकारू में लोगो ने चार कन्धा दे दिया
बारिश ने भी साथ न दिया  फिर मिटटी के  हवाले कर दिया
मुझे तो  लोगो  ने  मनहूस  करार  दे दिया
दिनेश पारीक

बुधवार, 22 अगस्त 2012

पुराने रास्ते


  मंजर  भी वही  था रास्ते अलग थे
मंजिल वही थी पर हमसफ़र अलग थे
कहानी वही थी पर सपने अलग थे
आवाज़ वही थी पर कदम अलग थे
 चाँद भी  आराम पे था रास्ता भी सुनसान था
पीछे से आवाज़ आयी मैं कुछ हेरान था
मैं कुछ चोंका मैं कुछ ठिठका
मन  मैं कुछ खटका हाथ से मते कुछ चटका
तुम कहा चले ? हमें था इतंजार तेरा
बेसर्मो की तरह चले जा रहे हो
 मंजिल की तरफ  बढे जा रहे हो
मैं वही हूँ रास्ता पुराना तेरा
मैं वही हूँ  हमसफ़र पुराना तेरा
अब मैं क्या कहू साथी मेरे
हम तो दुनिया से अलग थे
मंजिल मेरे यार तो अब और तब भी वही थी
तब दोस्त हम थे  और दुश्मन तुम थे
लोग कस्तिया बदलते थे | तुम हमसफ़र बदल ते थे
नशीब तो मेरे साथ नहीं था पर तुम मेरे साथ कहा थे
  मंजर  भी वही  था रास्ते अलग थे
मंजिल वही थी पर हमसफ़र अलग थे




गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

मेरा ही नशीब था

न कमी थी कोई जहान में कमजोर मेरा ही नशीब था
सब कुछ पास था उस के | मुझे देने के लिए वो गरीब था |
उस ने बहुत धन दोलत दिया दुनिया को पर में तो एक गरीब था |

जो भी मिला उसी से मिला | ये मेरा ही नशीब था
मेरा जनम हुआ ये भी उस के लिए बड़ा अजीब था |
कोई हंशा, कोई रोया मेरे घर का ये माहोल था
उस वक़्त माँ का दर्द में न समझ पाया था
पर मुझे पता है माँ के में कितना करीब था

जन्म की रात काली थी | चाँद भी न आया था
दिन में बदलो ने डाला डेरा ये मेरा नशीब था
दादा जी कहते है वो साल पड़ा बड़ा अकाल था |
सब कुछ कला था सिर्फ वो ही मेरा गुनगार था
ये कैसा  मेरा नशीब था | ????????

बचपन बिता जवानी आई , घर छोड़ा ये कितना अजीब था
आज तो माँ की ममता के लिए जीता हूँ  | हर रोज़ गम पिता हूँ 

पांच भाई बहनों में बटी माँ की ममता ये भी मेरा ही नशीब था
गाव छोड़ के आया लेकिन यहाँ भी जीना मुहाल था ................

आज आज माँ के साथ मंदिर गया
मंदिर में किसी ने पूछा तेरा चेहरा इतना उदास क्यों है| ?????
बरसती आखों में प्यास क्यों है और तुम मंदिर में क्यों हूँ
जिनकी नजरो में तू कुछ भी नहीं वो तेरे लिए आज इतना खास क्यों है ||?
मैं कुछ न बोल पाया क्यों की वो भी तो मेरा ही रकीब था
न कमी थी कोई जहान में कमजोर मेरा ही नशीब था
दिनेश पारीक