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बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

आज फिर जीने का मन करता है

आज फिर जीने का मन करता है 
आज की इस हवा को छुने का मन करता है 
कभी इस संघर्ष का अंत करने का मन करता है 
हर रोज़ एक नया सवेरा देखने का मन करता है 
कभी इस दो तिहाई मन को बाटने का मन करता है 
कभी इस नदियों की तरह छलकने का मन करता है ..................
कभी दुनिया का दर्द सहने का मन करता है 
कभी अकेले अकेले रोने का मन करता है >>>>>>>>
सपनो से अपने सपने चुराने का मन करता है 
कभी कभी इस दुनिया  को सपना बनाने  का मन करता है 
आज फिर वापिस लोटने का मन करता है >....................................
कभी उस धुप को पकड़ने का मन करता है 
कभी उस छाव को छुपाने का मन करता है 
फिर उस बचपन में जाने का मन करता है >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
फिर दोबारा माँ की लोरी सुन ने का मन करता है 
कभी बीते दिन को भूल जाने का मन करता है 
कभी कभी मर के भी जीने का मन करता है 
आज फिर जीने का मन करता है >>>>>>>>>>>>>>>>>>
दिनेश पारीक 

सोमवार, 23 जुलाई 2012

मेरे मन का दर्द


आजकल तो वक़त बदला बदला नज़र आता है |
इन  सालो में हवा का रुख भी मुड़ा मुड़ा नज़र आता है||
 दादा जी मेरे कहा करते थे पुराणी कहानिया
वो अपने  ज़माने  की बहुत सी निशानिया
की आज फिर वो नए नए कपडे पहने नज़र आता है |
आजकल तो वक़त बदला बदला नज़र आता है ||
खोखले लोग, सोच खोखली , खोखली बातें सारी।
दस्तूर दौर यही होगा रोएगी खोखल दुनिया सारी।
वो पुराणी बैठक  भी  भी तनहा तनहा जी लगती है || आजकल तो .......
 अब तो मेरे ज़माने का दस्तूर भी बदल गया  है
दवाईया, और दवाईया अस्पताल में सज  गया है  
मेरे   गावं  उन महोलो में दारू बेची जाती  है
मेरी बहनों को दहेज़ के लिए मरी पिटी जाती है
 कहा मैने भी ये नई नहीं वो आपकी रित पुराणी है
 सच कहू तो हमारी नहीं दादा जी ये आपकी निसानी है
आज फिर देखूं  तो इन्सान में  पैसा ही नज़र  आता है ||  आजकल तो,,,
 कल मैने  चलते चलते पूछ ली थी खबर  क्या है
खबर तो मुझे मिली पर  बदनामी की बू क्या है
घर आने मै देर क्या हुई   बहिन की नज़र भी क्या है
वो भी पूछ  बेठी गली की लड़की थो वो कोन ?
मां ने दादा जी ने भी कहा क्यूँ है तू मोन ?
मैं क्या बताऊ  वो थी कोन ?
सच कहू तो ये मेरी नहीं उनकी निगहबानी नज़र आती है ......
आजकल तो वक़त बदला बदला नज़र आता है |
इन  सालो में हवा का रुख भी मुड़ा मुड़ा नज़र आता है||



 

शुक्रवार, 1 जून 2012

मट मेला मेरा मन



जीवन की अधर अगनि में तो जल ही रहा हूँ
बुराइयों का छोटा सा घर भी तो बुन रहा हूँ

कभी कहता है मन की काश मैं पैदा होता महलों में
दूर से दिखाई देता ना गूम होता भीड़ भरे मेलों में
लोग झुकते सजदे में पहनाते मालाओं का हार
मन बोला क्यों देखता है सपना तू तो है लाचार
येही तो हर दिन बुन रहा हूँ |
बुराइयों का छोटा सा घर भी तो बुन रहा हूँ ||

अब तो खो गया हूँ झूठ और फरेब की दुनिया मैं
हर चेहरा हंस रहा है जूठी हंसी इस मेले मैं
मैं भी शामिल उन झूठे चेहरों में हूँ
मुख से दीखता भोला अन्दर से मेला हूँ
 तभी तो हर रोज़ एक फरेब बुन रहा हूँ

कभी उसकी कभी इसकी रोटी छीन रहा हूँ
जीवन की अधर अगनि में तो जल ही रहा हूँ