सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

वो लडकी पागल सी


वो लडकी पागल सी




किस पर यकीं करूं, मुझे
हर बात हकीकत लगती है
वो लडकी मुझको पागल सी
मेरी मोहब्‍बत लगती है


कुछ लोग उसे कहते हैं कातिल
कुछ जहां से बेगाना
इस शहर में मुझको सबसे
उसकी अदावत लगती है



वो चांद नहीं है, फूल नहीं है
नहीं-नहीं कुछ और है वो
जब जब घर से निकले वो
फिर एक कयामत लगती है



वो न कहे तो न कहे, पर
मुझको ये भी मालूम है
झुकी झुकी सी नजरों में
बस मेरी चाहत लगती है। 



आइए, मेरी बनके खुशी आइए

आइए, मेरी बनके खुशी,  आइए
मैं करूं आपकी बंदगी, आइए
आप खुद को न मुझसे जुदा होने दें
ख्‍वाबों की बज्‍म है सजी, आइए


है अंधेरा बहुत मेरे घर में सुनो
बन के आप शमां-रोशनी, आइए
मैं करूं इंतजार और कितना अभी
आना है तो क्‍यों न अभी आइए


मैं हूं आपका, गर है कोई शक
नाम की आपके जिंदगी आइए
हर लम्‍हा रहे बस साथ आपका
ऐसी होके कभी मेरी आइए



मैं  


गिरता हूं, उठता हूं फिर चल पडता हूं मैं
जाने किसकी तलाश में निकल पडता हूं मैं।
मेरे दिल में जुनून है और ख्‍वाब चश्‍म में
हर ठोकर पर और भी संभल पडता हूं मैं।।


न जाने कितनी मंजिलें पा चुका हूं मैं
एक और नई मंजिल पर आ चुका हूं मैं।
ये तश्‍नगी मेरी क्‍यों बुझना नहीं चाहती
ये रफतार मेरी क्‍यों रुकना नहीं चाहती।।


क्‍यों रुकूं मैं जब, सब रफतार में यहां
मेरे बाद और भी कई कतार में यहां।
मैं बढूंगा, लोग बढेंगे, परिवेश बढेगा
मेरा गांव, मेरे लोग, मेरा देश बढेगा।।