इस रह-ऐ उल्फत के मुसाफिर के साथ तूने क्या किया
कभी अपना लिया कभी ठुकरा दिया
मेरी मोहब्बत मिटटी का महल तो नहीं
कभी बना दिया तो कभी उसी मिटटी में मिला दिया
तुम ने मेरे साथ वो खुशियों की बारिश जिया हैं
कभी तुमने सरबत तो कभी शोक ऐ - जज्बात बना दिया
में कोई कठपुतली तो नहीं हूँ ऐ मेरे मेहरबां
जब तुमने पहना दिया चाहा तो उतार दिया
तुम ने मेरे साथ बेस -कीमती जिंदगी जिया है
कभी दुनिया को बता दिया कभी कभी तुमने छुपा लिया
में वो कुम्हार की मिटटी नहीं जो
पहले बना दिया फिर आग में झोंक दिया
आजकल लोगों का ये ही फलसफा है मेरे खुदा
कभी हमें याद कर लिया तो कभी हमें भुला दिया
में कोई चलती राहा नहीं ( में कोई रास्ता नहीं )
तुमने कभी ये पकड़ लिया कभी वो छोड़ दिया
तुम ने मेरे साथ जिदगी का वो किताब -ऐ मोहब्बत जिया
कभी तुमने लिख लिया कभी मिटा दिया
दिनेश पारीक ( तन्हां मेरा मन )