शनिवार, 10 मार्च 2012

आज फिर उदास है जिंदगी???

आज फिर उदास है जिंदगी???
आज फिर उदास है जिंदगी
ए जिंदगी तू क्या रंग लाएगी
समझ न पाया कोई
तू क्या मुझे समझ पाएगी
दर्द दिया है इस सिने में
क्यो तूने है मुझे रुलाया
इंतेज़्ज़र है जिसका मुझे
उनसे क्यो तूने मुझे न मिलाया
मिल भी गये गर कभी
तो क्या अंजाम देगी तू, ए जिंदगी
टूटे दिल को तूने मारना भी न सिखाया


रविवार, 4 मार्च 2012

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: मेरी ब्रिज भूमि की होली

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: मेरी ब्रिज भूमि की होली: जय श्री कृष्णा फिर से दो दिन बचे है होली के फिर वही जाना है श्री कृष्ण के दरबार मे मा को फिर फोन पे दीवाली पे आन...

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: जब इस्लाम मूर्ति पूजा के विरुद्ध है तो मुसलमान काब...

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: जब इस्लाम मूर्ति पूजा के विरुद्ध है तो मुसलमान काब...: काबा मतलब किबला होता है जिसका मतलब है- वह दिशा जिधर मुखातिब होकर मुसलमान नमाज़ पढने के लिए खडे होते है, वह काबा की पूजा नही करते. मुसलमान कि...

दो जन्म

हाँ , आज हुआ है मेरा
जन्म ,
एक शानदार हस्पताल में ....
कमरे में टीवी है ...
बाथरूम है ...फ़ोन है ....
तीन वक्त का खाना
आता है .....
जब मेरा जन्म हुआ
तो मेरे पास ...
डाक्टरों और नर्सों
का झुरमट ....
मेरी माँ मुझे देखकर
अपनी पीड़ा को
कम करने की कोशिश
कर रही है .....
हर तरफ ख़ुशी बिखर
गयी है मेरे आने से ....
दुनिया की हर अख़बार में ,
टीवी पे , फेसबुक पे ,
ट्विटर पे ......हर जगह
पे घोषणा हो रही है
हमारे आने की .....
मेरे पिता जी व्यस्त है
लोगों के मिलने में ...
फोन सुनने में ...
उनकी ख़ुशी का
कोई ठिकाना नहीं ...
चारों तरफ बस ख़ुशी ही ख़ुशी
हाँ मेरा भी जन्म हुआ
है आज ....
एक सडक के किनारे
गरीब की झोंपड़ी में .....
उस झोंपड़ी में ....
बस एक दिया है ...
जो न मात्र रौशनी दे रहा है .....
मेरी माँ पीड़ा से अभी भी
कराह रही थी .....
कोई डाक्टर या नर्स नहीं
आई थी ...
पास वाली झोंपड़ी से
ही एक औरत ने
आकर मेरे पैदा
होने में सहायता की .....
मेरे पिता जी उस वक्त
भी मजदूरी कर के घर
आए ......
कैसा है मेरा आना
कोई भी खुश नहीं हो रहा
सिवाए मेरी माँ के .....
मेरे पिता जी अब
यह सोच रहे है कि
पहले दो लोगों का
ही मुश्किल से चलता है ...
अब तीन तीन लोगों का ....
कैसे चलेगा ......
हाँ अगर किसी को
दरअसल ख़ुशी
हुई होगी तो मेरे
पिता जी के मालिक
को ....
जिसको लगा कि
उसका एक और
मजदूर बढ़ गया है ....
इन दोनों ही जन्मों
में जमीन आसमान
का फर्क है .....
हाँ अगर कुछ समान्य
है तो दोनों माताओं का
इस क्रिया से गुजरना
पर फिर भी हम कैसे
कह देते हैं ,
सभी मानुष एक से है
जभ भी सोचता हूँ ..
विचलित हो जाता हूँ ...
पर इसका जवाब मेरे
पास तो नहीं है .

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

क्यों पसरा है सन्नाटा

आया है माहौल चुनावी इस बार सन्नाटे में ...
द्वार द्वार न झंडे है न पोस्टर बैनर
न ही नेता दिखते शोर  मचाते न दिखते चमचे
क्यों पसरा है सन्नाटा बाजारों में और गलियों में
क्यों पकड़ा जाता बीच चौराहों पर कला धन सफ़ेद कपड़ो में
सभी पहने है सफ़ेद कपडे काले मन और तन पर
सभी मिताय्न्गे ब्रश्ताचार खा के कसम ये कहते  है 
इसने लुटा उसने लुटा इस बार लूटेंगे हम भी
इतनी बार बने हो वेबकुफ़ इस बार हमसे भी बन के देखो
नहीं है यू. पी. की सत्ता में सालो से 
अब चाहत है बनकर आने की युवराज  यू पी का
मिटा देंगे भुखमरी और गरीबी बेरोजगार  न होगा कोई 
कहते कहते गला दुःख गया है मेरा
अब तो सो जाओ जनता एक बार फिर से
सज धज कर आयेंगे इस बार लुटाने हम भी
क़तर देंगे माया रूपी जाल धन का ,मारंगे गुंडों  को घर पर
क्यों जग रही हो जनता भ्रष्टाचार के अन्धकार से
क्यों बर्बाद कर रहे हो करियर नेताओ   का
फरवरी की ठण्ड में और सो जाओ फिर देखो काम हमारा
नेता है हम भी बेरोजगारी मत बनाओ
तुम्हारी बेरोजगारी से ही तो रोजगार हमे है मिलता
क्यों पसरा है सन्नाटा बाजारों में
आशीष त्रिपाठी