मंगलवार, 30 नवंबर 2010

अँधेरा

‘अँधेरा’ एक उपेक्षित
तिरस्कृत, आलोचित पक्ष
लेकिन, क्या......
अँधेरे की गहनता को
शीतलता 
    को,
अपूर्व 
 प्रभाव  को
अनूठी शान्ति को 
  
तुमने कभी परचा है,
परखा है 
?  जब वह बिखेरता है  मखमली, निस्तब्ध
इन्द्रजाल सी खामोशी
तो चीखती - चिल्लाती दुनिया
;
एकाएक सो जाती है
,
तनाव मुक्त हो जाती है
!
अस्वस्थ 
– स्वस्थ,
अमीर - गरीब,
राजा - रंक सभी को
बिना भेद भाव के
निद्रा की चादर ओढ़ा
शान्त बना देता है,
यह अँधेरा...........!
कैसा मानवतावादी,
कैसा समाजवादी,
यह अँधेरा............!
भ्रष्टाचार, प्रदूषण, अशान्ति
सब  ठहर  जाते  हैं,
कितना  प्रभावशाली,
कितना  शक्तिशाली,
किन्तु निरा अस्थायी ........!!
                                                                       दिनेश  पारीक 




अँधेरे के कुएँ से
अँधेरे के कुएँ से
ळगातार बाहर आते हुए
कई बार मुझे लगा है
कि सूरज और मेरे बीच की दूरी
स्थाई है।
वो जो रह रहकर
मेरी आँखें चौंधियायीं थीं
वे महज धूप के टुकड़े थे
या रौशनी की छायाएँ मात्र ।

सूरज मेरी आँखों के आगे नहीं आया कभी
भरोसा दिलाने के लिए
जिसे महसूसकर
अक्सर उग आता रहा है
मेरी आँखों में
एक पूरा आकाश।

न ही मैंने महसूसा कभी
कि कोई सूरज प्रवाहित है मेरी धमनियों में
मेरे रक्त की तरह
जैसा मैंने कभी कहीं पढ़ा था।

फिलहाल तो
एक अँधेरे से दूसरे अँधेरे तक की दूरी ही
मैंने बार बार पार की है
और सूरज से अपने रिश्ते को
पहचानने पचाने में ही
सारा वक्त निकल गया है
और मैं खड़ी हूँ
वक्त के उस मोड़ पर अकेली
एक शुरूआत की सम्भावना पर विचार करती
जहाँ से रोशनी की सम्भावनाएँ
समाप्त होती हैं।



एक मुट्ठी भर सपने

एक मुट्ठी भर सपने
तितली के पंखों की तरह उजाड क़र
किताब के पन्नों में दबा दिए जाएँ
और सोचने को रह जाय
एक लम्बी घुटन और हताशा के पश्चात पाये हुए
उन चंद सपनों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाता
लगातार बदरंग होता चला जाता हुआ
अपना वर्त्तमान
तो क्या शेष रह जाता है?

तो क्या शेष रह जाता है
सिवाय इसके
कि एक बार फिर से
अंधेरे और यातना के
उसी लम्बे सफ़र पर
निकल पड़ा जाय
अपनी जिन्दगी की किताब
खुद और सिर्फ खुद के
हवाले कर ली जाय
जो रोशनी और रंग
अंधेरे के उस सफ़र में मिलें
उनसे कुछ बाकी बचे पन्ने
शौक से रंगे जायँ
और इस तरह
अवशिष्ट जो है
अर्थहीन होने से
बचा लिया जाय।

क्योंकि अबतक के जिए हुए
इस छोटे से जीवन में
बार बार के पलायन के बावजूद
लौटना हुआ है
और हर बार यही लगा है
कि जीवन ही सच है
और इसकी सार्थकता
जरूरी ...

मेरे जीवन को अर्थ देते
उसकी सम्पूर्णता का आश्वासन भरते
मेरे ये थोड़े से सपने ही तो हैं
मेरी मुटिठयों में बाँधे हुए
जो इन मुट्ठियों में
इतना दम आ गया है
कि मैं टकरा जाती हूँ
हर मुसीबत से ,
जीत जाती हूँ
हर बार...

अग्निशिखा

एक लपट उठी थी धरती के गर्भ से
आकाश को छू कर बरस पडी बूंदों में
सोख लीं वही बूंदें धरा ने
आया बसन्त तो
जन्म दिया पलाश के जलते फूलों को
एक बूंद अभागी
बरसी तो आकाश से
मगर न मिली धरा से
लिये अपना ज्वलन्त अस्तित्व
भटकी हवा में
कभी जलती दिये में 
कभी बहती लहर में
जुगनु सी जलती बुझती बूंद
एक रात के चौथे प्रहर में
स्वाति नक्षत्र में
एक प्यासे चातक ने
मुख खोला ही था 
बूंद के लाख मना करने पर भी
पी गया वह तृषित सा
जलती बूंद उतारता कैसे कंठ से?
जीवन भर 
सुलगती रही बूंद अग्निशिखा सी 
चातक के हृदय में 

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

यादें "हिन्दी" कविता की दुनियाँ

हिन्दी, उर्दू और हिन्दी में अनूदित काव्य के इस विशाल संकलन में आपका स्वागत है। यह एक खुली परियोजना है जिसके विकास में कोई भी भाग ले सकता है -आप भी! आपसे निवेदन है कि आप भी इस संकलन के परिवर्धन में सहायता करें। देखिये कविता कोश में आप किस तरह योगदान कर सकते हैं।

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