जब उठाया घूंघट तुमने,
दिखाया मुखड़ा अपना
चाँद भी भरमाया
जब बिखरी तुम्हारे रूप की छटा
चाँदनी भी शरमायी
तुम्हारी चितवन पर
आवारा बादल ने सीटी बजाई ।
तुमने ली अगंड़ाई, अम्बर की बन आई
तुमसे मिलन की चाह में फैला दी बाहें,
क्षितिज तक उसने
भर लिया अंक में तुम्हें, प्रकृति, उसने
तुम्हारे गदराये बदन, मदमाते यौवन पर,
भँवरे की तरह
फिदा होकर, तुम्हारे रसीले होठों से
रसपान किया उसने ।
नारी ने तुमसे ही सीखा श्रृंगार, प्रकृति
पुरुष ने सीखी मनुहार
एक रिश्ता कायम हुआ फिर
‘समर्पण’ का
पुरुष की कठोरता और
नारी की मधुरता का
पुरुष की मनुहार और
नारी की लज्जा का
पुरुष और प्रकृति एकाकार हुए
♣ इस ब्लॉग की किसी भी पोस्ट को अथवा उसके अंश को किसी भी रूप मे कहीं भी प्रकाशित करने से पहले अनुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें। ♣ क्यों था उरने को व्याकुल मेरा मन! वह नव बसंत का आगमन था ,
बुधवार, 8 फरवरी 2012
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
7 टिप्पणियाँ:
बहुत सुन्दर..
पुरुष और प्रकृति एकाकार हुए..
वाह!!
पुरुष की कठोरता और
नारी की मधुरता का
पुरुष की मनुहार और
नारी की लज्जा का
पुरुष और प्रकृति एकाकार हुए .......nice one .
बहुत बढ़िया!
बहुत सुंदर भाव......
उत्कृष्ट प्रस्तुति |
वाह बहुत खूब ...
आपकी रचनाए बहुत सुंदर लगी
आप मेरे दूसरे ब्लॉग पर भी अपनी प्रतिक्रिया देवे
हतत्प://वानगायडिनेश.ब्लॉगस्पोट.इन/
http://vangaydinesh.blogspot.in/
एक टिप्पणी भेजें