रविवार, 9 दिसंबर 2012

नारी


कभी आसमान तो कभी  धरती  भी  कहा करते हैं 
फिर  नारी  की समुन्दर से तुलना किया करते है 
पता नहीं क्यों लोग लड़की को बेजान कहते हैं ? 
फिर एक नारी को मर्दो की शान कहते है  
उन  मैं भी उनकी इज्जत आबरू कहते हैं ?
फिर उस लुटी नारी को किस्मत की मारी कहते हैं 
 कभी आसमान तो कभी  धरती  भी  कहा करते हैं 
फिर  नारी  की समुन्दर से तुलना किया करते है 
लुट के आबरू दबा के पैरों मैं 
फिर उसी को ही बदनाम किया करते हैं 
न जाने क्यों लोग 
उसी मैं अपनी शान समझ ते हैं ?
लुट के अस्मत- लुट के आबरु 
लुट के उन  की जिंदगी 
घर आके नारी को ही माँ कहते हैं 
न जाने क्यों लोग इस मैं भी  मर्दों  की शान कहते है ?
कभी उस को सीता कभी उस को गीता 
कभी उस को द्रोपती   कहते हैं ?
फिर उसी नारी को करके खड़ा  
अपने ही घर मैं बे आबरू करते हैं 
फिर उसी  दुर्गा नारी की पूजा करते हैं

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही प्रभावी एवं भावमय प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  2. बहुत खूब - यही दोगलापन टीसता है

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  3. अपने ही घर में बे-आबरू करते हैं
    फिर उसी दुर्गा नारी की पूजा करते हैं
    अद्धभुत अभिव्यक्ति !!

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  4. आपका लेख सच्चाई के करीब नहीं बल्कि सत्य है

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  5. आपका लेख सच्चाई के करीब नहीं बल्कि सत्य है

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  6. एक सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति...

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  7. वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  8. जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ स्वयं भगवान निवास करते है...बेहतरीन प्रस्तुति के लिए बधाई..

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  9. न जाने कब समाज की सोच नारी के प्रति बदलेगी???
    बहुत सुंदर प्रस्तुति।।।

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  10. बदलाब की जरुरत है. सुंदर प्रस्तुति.

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  11. नमन करता हूं मैं आप की सुंदर अभिव्यक्ति को। इस कविता में जिस प्रकार आप ने सत्य को प्रदर्शित किया है कविता पढ़ने के बाद कोई भी मंथन करने पर बाध्य हो जाएगा।

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  12. नारी के जाने कितने ही रूप है .फिर भी ...
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ..

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  13. सशक्त व प्रभावी रचना..

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  14. यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रम्यंते तत्र देवताः

    अच्छे भाव हैं दिनेश जी
    अच्छे काव्य-प्रयास के लिए बधाई !

    लिखते रहें … और श्रेष्ठ लिखते रहें …


    शुभकामनाओं सहित…

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