सोमवार, 21 जनवरी 2013

झरना




झर- झर कर बहता झरना
पहाड़ों से पानी का गिरना।
पानी से पानी का गिरना
आदमी, जमाने का पानी गिरना॥

शर्म से या इज्जत से गिरना
गिरना तो आखिर गिरना ही गिरना।
झरने से पानी का गिरना
आदमी का आँखों से गिरना॥

आज के गिरने में बहुत अंतर है
भांति – भांति इसके मंत्र है॥
कलि युगी श्रवण इसके उदाहरण है।
जो एक दम साधारण है

जन्म दाता के चरण छूना।
समझ ते है  अपनी इज्जत का गिरना॥
धके मार-2 निकाल देते है अपने पिता को।
मिलाकर साथ अपनी प्रियतमा प्रेमिका को॥

हो चुका है  एक दम आम
नित्य गिरना नेताओं का काम
निज स्वार्थ घोटाले ओर काण्ड  करना
एक पाला छोड़ दूसरा बदलना
झर- झर कर बहता झरना
क्या ये नहीं है राजनीति का गिरना

यही हाल है आज के भावों का
मेवा मिष्ठान ओर दालों का
हर दुकान का अलग-अलग दाम
मिठाई में है देशी घी का काम


सदुपयोग डालडा का ओर कम तोलना
ये भी है एक जात का  गिरना

अनाजों के देखो आप अख़बारों में दाम
बाजार मंदा प्रतिष्ठानों में हुआ हल्का काम
चने में रहेगी 10 दिनों तक मन्दी
बाजरा 100 रु प्रति क्वि.  महंगा

चने की दालों में आई गर्मी
धान चढ़ा 20रु तक महंगा
बेसन में १० रु तक तेजी
गेहूँ में १०० रु का उछाल

जो केरोसिन आता था २५रु में पाँच लिटर
पेट्रोल प्रति दिन महंगा अब ८५ रु लिटर
कपड़े के व्यापारी
करते है गरीबो संग गद्दारी
यदि आ जाए दुकान में कोई अफसर
पीछे भागते लसर-२ सलाम मारते पसर-२

९० का कपड़े देते है ८० में
देना पड़ता उनको फस्सी  में
यदि ओर कोई कहे भाई करो १रु कम
तो भर लेते है एक दम से दम
कहते है ये है हमारा थोक का दाम
तभी तो बाजार में है हमारा नाम
वो खादी जो गरीब पहना करते थे

बापू गांधी आपने हाथों से बुना करते थे
आज पहनते है बड़े- बड़े राजनेता
करते है खादी को अपमानित ओर गंदा
कितने शर्म की बात है
चुल्लू भर पानी में डूब मरने की
सरकार ने खोली योजना ओ की दुकान
रिस्वत पे मिलते है इन्दिरा आवास के मकान
जिनके पहले थे वो फिर दुबारा ले गए
बिना घर वाले बिना घर के ही रह गए
पेसे वाले है बीपीएल कार्ड धारी
गरीब जनता भूख की मारी

आदमी को चाहिए रोटी,कपड़ा ओर मकान
बिना इस के रहते है भारत में ४०% इंसान
भाई क्या ये नहीं है इंसान का गिरना
झर- झर कर बहता झरना
पहाड़ों से पानी का गिरना।
कही गलती हो तो माफ करना
इसको समझ लेना मेंरा गिरना
झर- झर कर बहता झरना