रविवार, 13 जनवरी 2013

मैं अब नहीं रोउंगी

मैं अब नहीं रोउंगी 
 अब मैं  हसुँगी  अब मेरे साथ पूरा  देश हँसेगा 
अब तुम  रोवोगे अब मैं  हसुँगी
तुम तो मेरे कर्जदार  थे ही 
हे खुदा  तुम ने किस मिटटी  को 
मेरा वफादार  बना दिया 
जिस मिटटी  को मैंने मेरे हाथो  से सजाया  था 
उस  वफादार को ही तूने  इज्जत  का लुटेरा बना दिया 
तू क्यूँ नहीं समझ रहा ऐ  खुदा 
मैं नहीं महफूज  इस  धरा   पर
 तूने  कह तो  मैंने  बना दिया  इस को 
ये मुझे  ही  नोच  रहा है इस धरा  पर 
क्या  तूने  कहा है की वो मुझे मिटा  दे 
एक बार तू मुझे कह दे  मैं उसे  मिटा दूंगी 
ना  मैं अब  रोउंगी ना  तेरे  दर पे आउंगी 
अब तू  देख वो नहीं  माना  तो 
जिन  हाथो  से बनाया  था  
उन हाथो  से उसे मैं  मिटा दुंगी 

19 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुंदर कृति
    ---
    नवीनतम प्रविष्टी: गुलाबी कोंपलें

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  2. आक्रोश लिए ... अगर ये हो गया तो पुरुष समाज रोयेगा अपने कर्मों पे ...
    फिर भी जागता नहीं पता नहीं क्यों ...

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  3. bahut khoobsurat rachan aur aakrosh se bhari hui aapki soch ko naman hia dinesh jee

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  4. आखिर हर जुल्म का अंततः अंत होता ही है लेकिन हम उसके अंत का इन्तेज़ार क्यों करें उसके दूर करने में भागीदार बने.

    लोहड़ी, मकर संक्रान्ति और माघ बिहू की शुभकामनायें.

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  5. तूने कह तो मैंने बना दिया इस को
    ये मुझे ही नोच रहा है इस धरा पर ....
    सही और सार्थक रचना ।
    मकर सक्रांति की शुभकामनायें

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  6. सार्थक चेतावनी की गर्जना

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  7. सटीक चेतावनी देती हुई प्रभावी रचना
    सादर !

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  8. एक बार तू मुझे कह दे मैं उसे मिटा दूंगी
    ना मैं अब रोउंगी ना तेरे दर पे आउंगी
    अब तू देख वो नहीं माना तो
    जिन हाथो से बनाया था
    उन हाथो से उसे मैं मिटा दुंगी
    सटीक चेतावनी देती हुई प्रभावी रचना

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  9. औरत अब डरना छोड़े ....उसे मज़बूत बनना होगा !
    मंगलकामनाएं !

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  10. बेहतरीन सार्थक चेतावनी भरा भाव,बहुत ही सुन्दर।

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  11. इस चुनौती का सामना करने के लिये कुछ कड़े कदम कुछ कठोर निर्णय लेने ही पड़ेगें.

    सार्थक प्रस्तुति.

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  12. सुंदर और सार्थक प्रस्तुति

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