चुप अधरों में बन्द शब्दों के भेद को कैसे पढ़ेगा
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से
सुबह सिरहाने बैठ एक किरण चुनती है नींद नयन से
प्रतिदिन शाम की बाती भी जलती है चुपचाप नियम से
उस सुबह से शाम तक के वही पुराने रंग ढंग में
चुलबुलापन देख कर भी ढल गया सूरज चुपचाप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से
कुहरे की एक झीनी चूनर ने ढका ज्यों पर्वत का बदन
चंदा के मुख को चूम बदरी चली संग संग अपने सजन
खेल ऐसे देख दबे पांव आयी लाज छू गयी मेरा भी तन
आंखों के बिछौने में नींद लडती रही अपने आप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से
चंचलता और अकुलाहट में फंसा मन कर रहा हाहाकार
एक निराकार स्वप्न को हृदय ने रूप दे दिया है साकार
सही गलत के ताने बाने में उलझ रह गया अहंकार
प्रेम सुधा में विष घुलेगा जब मन हो नहाया पाप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से
2 टिप्पणियाँ:
मुकेश जी
माफ किजियेंगा , मैं आपके ब्ल्पोग पर नहीं आ पाया .
आपकी कविता का क्या कहने , शृंगार रस से भरपूर है और जीवन को आमंत्रण देती हुई है . और भी कविताएं पढ़ी , बहुत सुन्दर है , आपके बात को प्रस्तुत करने का अंदाज़ ही जुदा है .
अब नियमित रूप से आपके ब्लॉग पर आते रहूँगा .
आपका विजय
आपकी रचनाए बहुत सुंदर लगी
आप मेरे दूसरे ब्लॉग पर भी अपनी प्रतिक्रिया देवे
हतत्प://वानगायडिनेश.ब्लॉगस्पोट.इन/
http://vangaydinesh.blogspot.in/
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