रविवार, 12 अगस्त 2012

मंजिल हर रोज़ वो हमें बुला लेती है


 हर रोज़  कश्तिया डूबती है तो कभी सपने टूट जाते  है
हम वही पर  पानी पे खड़े रहे जहाँ ये सपने छुट जाते   हैं
हल्का हल्का सा आँखों को एहसास होता है
छलकती है मेरी भी आँखों से नमी
जब दिन और रात बदल कर सपनो की मंजिल बदल जाती है ||
कभी  कभी कहता है मन काश ये सपने न होते
काश ये दर्द अ शोकत न होती
मंजिल मिले या न मिले पर
हो न हो ये  सपनो की शोहबत न होती
आज फिर न जाऊ ये तो हर रोज कहता हूँ
पर हर रोज़ ऑंखें भीग कर मुकर जाती है ||
पोछने का सिलसिला तो भूल गया हूँ
पर ये हर रोज़ सिकुड़ जाती है ||
फासला तो हाथ दो हाथ का ही रहता है पर ?
हर रोज़ की तरह मंजिल भी हमें भूल जाती है
काश वो दो पल सकून के हमें भी दे देती
जब पास हम उनके होते
काश  देखने का नज़ारा हमें भी मिले
 जब पास होते
पर हर रोज़ वो पास आकर धुधली पड़ जाती है
हर रोज़  कश्तिया डूबती है तो कभी सपने टूट जाते  है ||
हम तो जाते भी नहीं पर
हर रोज़ वो हमें बुला लेती है  जाता हूँ पास तो
अपने आपको  मिटटी की तरह मिटा लेती है
 हर रोज़  कश्तिया डूबती है तो कभी सपने टूट जाते  है
हम वही पर  पानी पे खड़े रहे जहाँ ये सपने छुट जाते   हैं