मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

तुम बोना कांटे

तुम बोना कांटे
तुम बोना कॉंटे;
क्योंकि फूल न पास तुम्हारे।
बो सकते हो
वही सिर्फ जो
उगता दिल में;
चरण पादुका
ही बन सकते
तुम महफिल में।
न देव शीश पर चढ़ते कॉंटे
सॉंझ सकारे ।
हॅंसी किसी की
अरे पल भर भी
सह न पाते;
और बिलखता देख किसी को
तुम मुस्काते ।
जो डूबते
उनको देखा
बैठ किनारे।
जीवन देकर भी है हमने
जीवन पाया;
अपने दम से
रोता मुखडा
भी मुस्काया।
र्सौ सौ उपवन
खिले हैं मन में;
तभी हमारे।