प्रेम कविताएँ

मेरी व्यथा
चुप अधरों में बन्द शब्दों के भेद को कैसे पढ़ेगा
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से

सुबह सिरहाने बैठ एक किरण चुनती है नींद नयन से
प्रतिदिन शाम की बाती भी जलती है चुपचाप नियम से
उस सुबह से शाम तक के वही पुराने रंग ढंग में
चुलबुलापन देख कर भी ढल गया सूरज चुपचाप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से

कुहरे की एक झीनी चूनर ने ढका ज्यों पर्वत का बदन
चंदा के मुख को चूम बदरी चली संग संग अपने सजन
खेल ऐसे देख दबे पांव आयी लाज छू गयी मेरा भी तन
आंखों के बिछौने में नींद लडती रही अपने आप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से

चंचलता और अकुलाहट में फंसा मन कर रहा हाहाकार
एक निराकार स्वप्न को हृदय ने रूप दे दिया है साकार
सही गलत के ताने बाने में उलझ रह गया अहंकार
प्रेम सुधा में विष घुलेगा जब मन हो नहाया पाप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से