शुक्रवार, 4 मार्च 2011

-ज़िंदगी का एक और रंग-


तेरी यह मायूसी बन जाती है बेचैनी मेरी
ज़िंदगी से तेरा खफा होना, लगे ज़िंदगी है ख़फा मेरी
तेरी सासों से मैं खुद सास लेती हूँ
चहरे पे उदासी तेरी, लगती है हार मुझे अपनी
मेरे लिए क्या चाँद क्या सूरज क्या तारे
तू साथ हो तो सब लगते है अपने प्यारे
पर तू रूठा है इस्कदर खुद से ही
लगे तूफान आया हो मिटाने पहचान मेरी
तेरी हसी पे घायल हुए थे, निराली तेरी हर अदा
तेरी मोहब्बत को आपना समझ जी रहे थे
तू अब ना जा छोड़ के, ना हो मुझसे जुदा
तेरे बिन हर रंग फीका लगता है आँखो को मेरी