मंगलवार, 30 नवंबर 2010

अग्निशिखा

एक लपट उठी थी धरती के गर्भ से
आकाश को छू कर बरस पडी बूंदों में
सोख लीं वही बूंदें धरा ने
आया बसन्त तो
जन्म दिया पलाश के जलते फूलों को
एक बूंद अभागी
बरसी तो आकाश से
मगर न मिली धरा से
लिये अपना ज्वलन्त अस्तित्व
भटकी हवा में
कभी जलती दिये में 
कभी बहती लहर में
जुगनु सी जलती बुझती बूंद
एक रात के चौथे प्रहर में
स्वाति नक्षत्र में
एक प्यासे चातक ने
मुख खोला ही था 
बूंद के लाख मना करने पर भी
पी गया वह तृषित सा
जलती बूंद उतारता कैसे कंठ से?
जीवन भर 
सुलगती रही बूंद अग्निशिखा सी 
चातक के हृदय में 

6 टिप्‍पणियां:

  1. कल 05/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  3. सुलगती रही बूंद अग्निशिखा सी
    चातक के हृदय में ...

    वाह! बहुत सुद्नर अभिव्यक्ति...
    सादर...

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  4. बेहतरीन अभिव्यक्ति

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